श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 7: भगवान् चैतन्य के पाँच स्वरूप  »  श्लोक 151
 
 
श्लोक  1.7.151 
तबे सब सन्यासी महाप्रभुके लैया ।
भिक्षा करिलेन सभे, मध्ये वसाइया ॥151॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद सभी संन्यासियों ने भगवान को अपने मध्य में ले लिया और इस प्रकार सबने एक साथ भोजन किया।
 
After this, all the monks took Mahaprabhu among them and they all had food together.
तात्पर्य
इससे पहले श्री चैतन्य महाप्रभु मायावादी सन्यासियों से न तो मिले थे और न ही बात की थी किन्तु अब उन्होंने उनके साथ भोजन किया। यह तो मानना ही होगा कि जब भगवान चैतन्य ने उन्हें हरे कृष्ण नाम का जाप करने को प्रेरित किया और उनके अपराधों को माफ किया, तब वे पवित्र हो गए थे इसलिए अब उनके साथ भोजन अर्थात् भगवत प्रसाद लेने में कोई आपत्ति नहीं थी यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु जानते थे कि उस भोजन को भगवान को नहीं चढ़ाया गया था। मायावादी सन्यासी भगवान की पूजा नहीं करते या अगर वे करते भी हैं तो वे सामान्यतया भगवान शिव या पंचोपासना (भगवान विष्णु, भगवान शिव, दुर्गा देवी, गणेश तथा सूर्य देव) का ही पूजन करते हैं। यहाँ हम देवताओं या विष्णु के लिए कोई उल्लेख नहीं पाते और फिर भी चैतन्य महाप्रभु ने सन्यासियों के बीच इसलिए भोजन स्वीकार किया क्योंकि उन्होंने हरे कृष्ण महामंत्र का जाप किया था और उन्होंने उनके अपराध क्षमा किये थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)