प्रेमा हैते कृष्ण हय निज भक्त - वश ।
प्रेमा हैते पाय कृष्णेर सेवा - सुख - रस ॥145॥
अनुवाद
"परमेश्वर, जो महानतम से भी महान हैं, अपनी भक्ति के कारण एक अत्यंत तुच्छ भक्त के भी अधीन हो जाते हैं। भक्ति का यह सुंदर और उत्कृष्ट स्वरूप है कि इसके कारण अनंत भगवान भी उस सूक्ष्म जीव के अधीन हो जाते हैं। भगवान के साथ पारस्परिक भक्ति क्रियाओं में, भक्त वास्तव में भक्ति के दिव्य रस का आनंद लेता है।
"The Supreme Lord, the greatest of all, becomes subservient to even the most humble devotee through devotional service. Such is the beautiful and elevated nature of devotion that the infinite Lord becomes subservient to the subtle being through his devotion. In the exchange of devotional acts with the Lord, the devotee experiences the true joy of the transcendental essence of devotion.
तात्पर्य
भगवान के साथ एक होना भक्तों के लिए बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं होता है। मुक्तिः स्वयं मुकुलितांजलि सेवतेऽस्मान (कृष्ण-करनामृत 107)। अपने अनुभव से श्रील बिल्वमंगल ठाकुर जी ने कहा है कि यदि भगवान के प्रति प्रेम हो जाये तो मुक्ति उनके लिए छोटी और незнаयक हो जाती है। मुक्ति भक्त के सामने खड़े होकर उनकी तरह-तरह की सेवा करने के लिए तैयार रहती है। मायावादी तत्वज्ञानियों का मुक्ति का जो रूप है वो भक्तों के लिए बहुत ही नाचीज है। जिस प्रकार भगवान के भक्त होने से स्वयं भगवान ही उनके अधीन हो जाते हैं। जैसे भगवान कृष्ण अर्जुन के सारथी बन गए और जब अर्जुन ने उनसे दोनों सेनाओं के बीच में रथ को रोकने को कहा (सेन्योर उभयोर मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत) तो भगवान ने उनके आदेश का पालन किया। भगवान और भक्त के मध्य यही रिश्ता होता है कि भगवान भले ही सबसे महान हैं इसके बाद भी उनकी सेवा करने के लिए वह छोटे से छोटे भक्त के भी सामने झुकने को तैयार रहते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योकि भक्त प्रभु के लिए अपने दिल से और बिना कुछ इच्छा रखे भक्ति करता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥