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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 6: श्रीअद्वैत आचार्य की महिमाएँ अध्याय सात  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  1.6.99 
ज्येष्ठ - भावे अंशीते हय प्रभु - ज्ञान ।
कनिष्ठ - भावे आपनाते भक्त - अभिमान ॥99॥
 
 
अनुवाद
सभी अवतारों के स्रोत में जब वह स्वयं को स्वामी मानते हैं तो उनमें श्रेष्ठता की भावना होती है, और जब वह स्वयं को भक्त मानते हैं तो उनमें निम्नता की भावना होती है।
 
When they consider themselves as masters, then there is a feeling of seniority in the origin of all the incarnations and when they consider themselves as devotees, then there is a feeling of juniority in them.
तात्पर्य
किसी विशेष वस्तु के अंश को भाग कहते हैं और वह जिससे अंश निकाला जाता है, पूर्ण कहलाता है। इसलिए अंश या भाग पूर्ण के अंतर्गत आता है। भगवान पूर्ण हैं और भक्त अंश या भाग हैं। भगवान और भक्त के बीच यही संबंध है। भक्तों के पद भी होते हैं जिन्हें अधिक या कम के रूप में गिना जाता है। जब कोई भक्त महान होता है, उसे प्रभु कहा जाता है और जब वह छोटा होता है, तो उसे भक्त या भक्त कहा जाता है। सर्वोच्च पूर्ण कृष्ण हैं और बलदेव और सभी विष्णु अवतार उनके अंश हैं। इसलिए भगवान कृष्ण अपनी श्रेष्ठ स्थिति के प्रति जागरूक हैं और सभी विष्णु अवतार भक्तों के रूप में अपनी स्थिति के प्रति सचेत हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)