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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 6: श्रीअद्वैत आचार्य की महिमाएँ अध्याय सात  »  श्लोक 97
 
 
श्लोक  1.6.97 
ए - सबाके शास्त्रे कहे ‘भक्त - अवता र’ ।
‘भक्त - अवता र’ - पद उपरि सबार ॥97॥
 
 
अनुवाद
शास्त्र उन्हें भक्तावतार कहते हैं। ऐसे अवतार का स्थान अन्य सभी से ऊपर होता है।
 
The scriptures call him a devotee-incarnation. Such an incarnation has a status above all others.
तात्पर्य
परमेश्वर भगवान विभिन्न अवतारों में प्रकट होते हैं, लेकिन एक भक्त की भूमिका में उनकी उपस्थिति अन्य अवतारों या उनके सभी वैभव के लिए वातानुकूलित आत्माओं के लिए ज़्यादा लाभकारी है। कभी-कभी एक वातानुकूलित आत्मा हैरान रह जाती है जब वह संपूर्ण ऐश्वर्य के साथ परमेश्वर के अवतार को समझने की कोशिश करता है। भगवान कृष्ण प्रकट हुए और कई असामान्य गतिविधियों का प्रदर्शन किया, और कुछ भौतिकवादियों ने उन्हें गलत समझा, लेकिन भगवान चैतन्य के रूप में उनकी उपस्थिति में उन्होंने अपने ऐश्वर्य को ज़्यादा नहीं दिखाया, और इसलिए कम वातानुकूलित आत्माएं भ्रमित हुईं। भगवान को गलत समझते हुए, कई मूर्ख खुद को भगवान के अवतार मानते हैं, लेकिन इसका नतीजा यह होता है कि भौतिक शरीर को छोड़ने के बाद वे गीदड़ की प्रजातियों में प्रवेश करते हैं। जो व्यक्ति अवतार के वास्तविक महत्व को नहीं समझ सकते हैं, उन्हें दंड के रूप में जीवन की ऐसी ही निचली प्रजातियों को प्राप्त करना होगा। वातानुकूलित आत्माएं जो झूठे अहंकार से भरी हुई हैं और जो सर्वोच्च प्रभु के साथ एक होने का प्रयास करती हैं, मायावादी बन जाती हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)