श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 6: श्रीअद्वैत आचार्य की महिमाएँ अध्याय सात  »  श्लोक 92
 
 
श्लोक  1.6.92 
ताँहार प्रकाश - भेद, अद्वैत - आचार्य ।
काय - मनो - वाक्ये ताँर भक्ति सदा कार्य ॥92॥
 
 
अनुवाद
अद्वैत आचार्य उनका ही एक पृथक् अंश हैं। वे मन, वचन और कर्म से सदैव भक्ति में लीन रहते हैं।
 
Advaita Acharya is His separate expansion. He is always immersed in His devotion in thought, word, and deed.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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