अनन्त ब्र ह्माण्डे रुद्र - सदाशिवेर अंश ।
गुणावतार तेंहो, सर्व - देव - अवतंस ॥79॥
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अनुवाद
रुद्र, जो सदाशिव के विस्तार हैं और जो असीमित ब्रह्मांडों में प्रकट होते हैं, वे गुणावतार भी हैं और अनंत ब्रह्मांडों में सभी देवताओं के आभूषण हैं।
Rudra, the expansion of Sadashiva, who appears in countless universes and is the ornament of the gods in infinite universes, is also a Gunavatara.
तात्पर्य
रुद्र या भगवान शिव के ग्यारह विस्तार हैं। वे इस प्रकार हैं: अजैकपाद, अहिब्रध्न, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, देवश्रेष्ठ त्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित। इन विस्तारों के अलावा रुद्र के आठ रूप हैं जिन्हें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चंद्र और सोम-यज्ञी कहा जाता है। आम तौर पर इन सभी रुद्रों के पाँच चेहरे, तीन आँखें और दस हाथ होते हैं। कभी-कभी यह पाया जाता है कि रुद्र की तुलना ब्रह्मा से की जाती है और उसे एक जीवित इकाई माना जाता है। लेकिन जब रुद्र को भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के एक आंशिक विस्तार के रूप में समझाया जाता है, तो उसकी तुलना शेष से की जाती है। इसलिए भगवान शिव एक साथ भगवान विष्णु के विस्तार हैं और सृष्टि के विनाश की उनकी क्षमता में, जीवित संस्थाओं में से एक हैं। भगवान विष्णु के विस्तार के रूप में उन्हें हर कहा जाता है, और वह भौतिक गुणों से परे हैं, लेकिन जब वह तमो-गुण के संपर्क में आते हैं तो वे प्रकृति के भौतिक स्वरूपों से दूषित दिखाई देते हैं। इसकी व्याख्या श्रीमद्-भागवतम् और ब्रह्म-संहिता में की गई है। श्रीमद्-भागवतम्, दसवें कांड में, यह कहा गया है कि भगवान रुद्र हमेशा भौतिक प्रकृति के साथ जुड़े रहते हैं जब वह निष्पक्ष, अव्यक्त स्थिति में होती है, लेकिन जब भौतिक प्रकृति के मोड उत्तेजित होते हैं तो वह भौतिक प्रकृति से दूर से जुड़ते हैं। ब्रह्म-संहिता में विष्णु और भगवान शिव के बीच के संबंध की तुलना दूध और दही के बीच से की गई है। दूध कुछ योजक द्वारा दही में परिवर्तित हो जाता है, लेकिन हालांकि दूध और दही के घटक एक ही होते हैं, उनके कार्य अलग-अलग होते हैं। इसी तरह, भगवान शिव भगवान विष्णु के विस्तार हैं, फिर भी ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति के विनाश में भाग लेने के कारण, उन्हें दूध से दही में परिवर्तित होने के समान परिवर्तित माना जाता है। पुराणों में यह पाया जाता है कि शिव कभी ब्रह्मा के सिर से और कभी विष्णु के सिर से प्रकट होते हैं। विनाशक, रुद्र, संकर्षण से पैदा होते हैं और पूरी सृष्टि को जलाने की परम आग है। वायु पुराण में वैकुण्ठ ग्रहों में से एक में सदाशिव का वर्णन है। वह सदाशिव भगवान कृष्ण के रूप का प्रत्यक्ष विस्तार है। ऐसा कहा जाता है कि सदाशिव (भगवान शंभु) वैकुण्ठ ग्रहों (भगवान विष्णु) में सदाशिव का विस्तार है और उनकी पत्नी, महामाया, रामा-देवी, या लक्ष्मी का विस्तार है। महामाया भौतिक प्रकृति की उत्पत्ति या जन्मस्थान है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥