श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 6: श्रीअद्वैत आचार्य की महिमाएँ अध्याय सात  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  1.6.76 
आनेर कि कथा, बलदेव महाशय ।
याँर भाव - शुद्ध - सख्य - वात्सल्यादि - मय ॥76॥
 
 
अनुवाद
अन्यों की तो बात ही क्या, यहाँ तक कि भगवान बलदेव भी शुद्ध मैत्री तथा पितृवत प्रेम जैसी भावनाओं से परिपूर्ण हैं।
 
Leave aside others, even Lord Baladeva is full of feelings like pure friendship and affectionate love.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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