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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 6: श्रीअद्वैत आचार्य की महिमाएँ अध्याय सात  »  श्लोक 74
 
 
श्लोक  1.6.74 
तपश्चरन्तीमाज्ञाय स्व - पाद - स्पर्शनाशया ।
सख्योपेत्याग्रहीत्पाणिं साहं तद्गृह - मार्जनी ॥74॥
 
 
अनुवाद
"मुझे अपने चरण स्पर्श की इच्छा से तपस्या करते हुए जानकर, वे अपने मित्र अर्जुन के साथ आए और मेरा हाथ स्वीकार किया। फिर भी मैं तो श्रीकृष्ण के घर में झाड़ू लगाने वाली एक दासी मात्र हूँ।"
 
Knowing that I was performing penance to touch his feet, he came with his friend Arjuna and took my hand in marriage. Yet I am merely a maidservant sweeping the floor of Sri Krishna's house."
तात्पर्य
पिछले श्लोक की तरह, यह श्लोक समंत-पंचक में कुरु और यादव राजवंशों की महिलाओं की सभा के विषय में श्रीमद्-भागवतम (10.83.11) में प्रकट होता है। उस सभा के समय, कालिंदी नाम की कृष्ण की रानी ने इस तरह से द्रौपदी से बात की।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)