श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 6: श्रीअद्वैत आचार्य की महिमाएँ अध्याय सात  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  1.6.71 
हा नाथ रमण प्रेष्ठ क्वासि क्वासि महा - भुज ।
दास्यास्ते कृपणाया मे सखे दर्शय सन्निधिम् ॥71॥
 
 
अनुवाद
"हे मेरे प्रभु, हे मेरे पति, हे परम प्रियतम! हे महाबाहु प्रभु! आप कहाँ हैं? आप कहाँ हैं? हे मेरे मित्र, अपनी दासी को दर्शन दीजिए, जो आपकी अनुपस्थिति से अत्यंत दुःखी है।"
 
"O Lord! O my husband! O most beloved! O strong-armed one! Where are you? Where are you? O friend, why do you not appear before your maid, who is very sad because of your absence?"
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd