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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 6: श्रीअद्वैत आचार्य की महिमाएँ अध्याय सात  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  1.6.53 
कृष्ण - प्रेमेर एइ एक अपूर्व प्रभाव ।
गुरु - सम - लघुके कराय दास्य - भाव ॥53॥
 
 
अनुवाद
कृष्ण के प्रति प्रेम का एक अनूठा प्रभाव है: यह श्रेष्ठ, समान और कनिष्ठ लोगों में भगवान कृष्ण की सेवा की भावना भर देता है।
 
This is the unique effect of Krishna-love that it inspires teachers, peers and juniors to serve Lord Krishna.
तात्पर्य
भक्ति सेवा दो प्रकार की होती है: पाँचरात्रिक नियमों का मार्ग और भागवत आध्यात्मिक प्रेम सेवा का मार्ग। पाँचरात्रिक नियमों में लगे लोगों के लिए भगवान का प्रेम कम या ज्यादा समृद्ध और श्रद्धा मंच पर निर्भर करता है, लेकिन राधा और कृष्ण की पूजा पूरी तरह से आध्यात्मिक प्रेम के मंच पर होती है। यहां तक कि जो व्यक्ति कृष्ण के वरिष्ठ के रूप में खेलते हैं, वे भी भगवान को आध्यात्मिक प्रेम सेवा देने का मौका लेते हैं। भगवान के वरिष्ठ की भूमिका निभाने वाले भक्तों का सेवा भाव समझना बहुत मुश्किल है, लेकिन भगवान कृष्ण को सेवा का अपना विशेष महत्व समझने पर इसे बहुत स्पष्ट ढंग से समझा जा सकता है। एक ज्वलंत उदाहरण कृष्ण की सेवा करने वाली यशोदा की सेवा है, जो विशिष्ट है। नारायण के रूप में, भगवान केवल अपने साथियों से सेवा स्वीकार कर सकते हैं जो ऐसे हिस्से निभाते हैं जिनमें वे उनके समान या उनसे कम हैं, लेकिन भगवान कृष्ण के रूप में वे अपने पिता, शिक्षकों और अन्य बुजुर्गों से बहुत स्पष्ट रूप से सेवा स्वीकार करते हैं जो उनके वरिष्ठ हैं, और उनके समान और उनके अधीनस्थ हैं। ये बहुत ही अद्भुत है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)