श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 6: श्रीअद्वैत आचार्य की महिमाएँ अध्याय सात  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.6.25 
‘अंश’ ना कहिया, केने कह ताँरे ‘अङ्ग’ ।
‘अंश’ हैते ‘अङ्ग,’ याते हय अन्तरङ्ग ॥25॥
 
 
अनुवाद
श्रीअद्वैत को अंग क्यों कहा गया है, भाग क्यों नहीं? कारण यह है कि अंग का अर्थ है अधिक आत्मीयता।
 
So why is Sri Advaita called a part, not a part? The reason is that "part" indicates a greater intimacy.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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