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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 6: श्रीअद्वैत आचार्य की महिमाएँ अध्याय सात  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  1.6.14-15 
माया यैछे दुइ अंश - ‘निमित्त’, ‘उपादा न’ ।
माया निमित्त’ - हेतु, उपादान - प्रधान’ ॥14॥
पुरुष ईश्वर ऐछे द्वि - मूर्ति हइया ।
विश्व - सृष्टि करे ‘निमित्त’ ‘उपादा न’ लञा ॥15॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार बाह्य ऊर्जा के दो भाग होते हैं - निमित्त और उपादान, माया निमित्त कारण है और प्रधान उपादान - उसी प्रकार भगवान विष्णु भी निमित्त और उपादान कारणों से भौतिक जगत की रचना करने के लिए दो रूप धारण करते हैं।
 
Just as external energy has two parts: instrumental and material; Maya is the instrumental cause and the primary material cause, similarly, the Supreme Personality of Godhead, Vishnu, also assumes two forms to create the material world based on the instrumental and material causes.
तात्पर्य
निर्माण के मूल कारण को जानने के लिए दो तरह के शोध हैं। एक निष्कर्ष यह है कि सर्वोच्च ईश्वर, जो पूर्ण आनंदमय, सनातन, सब जानने वाला रूप है, परोक्ष रूप से इस सृष्टि का कारण है और प्रत्यक्ष रूप से आध्यात्मिक जगत का कारण है, जहां वैकुंठ नामक असंख्य आध्यात्मिक ग्रह हैं, साथ ही उनका निजी निवास है, जो गोलोक वृंदावन कहलाता है। दूसरे शब्दों में, दो अभिव्यक्तियाँ हैं - भौतिक जगत और आध्यात्मिक जगत। जैसा कि भौतिक जगत में असंख्य ग्रह और ब्रह्मांड हैं, उसी प्रकार आध्यात्मिक जगत में भी वैकुंठ और गोलोक सहित असंख्य आध्यात्मिक ग्रह और ब्रह्मांड हैं। सर्वोच्च भगवान भौतिक और आध्यात्मिक दोनों जगतों का कारण है। दूसरा निष्कर्ष, निश्चित रूप से यह है कि यह सृष्टि एक अज्ञात, अप्रकट शून्य के कारण है। यह तर्क निरर्थक है।

पहला निष्कर्ष वेदांत दार्शनिकों द्वारा स्वीकार किया जाता है, और दूसरा सांख्य स्मृति की नास्तिक दार्शनिक प्रणाली द्वारा समर्थित है, जो सीधे वेदांतिक दार्शनिक निष्कर्ष का विरोध करता है। भौतिक वैज्ञानिक कोई संज्ञानात्मक आध्यात्मिक पदार्थ नहीं देख सकते जो सृष्टि का कारण हो सकता है। ऐसे नास्तिक सांख्य दार्शनिक सोचते हैं कि असंख्य जीवित प्राणियों में दिखाई देने वाले ज्ञान और जीवन शक्ति के लक्षण सृष्टि के तीन गुणों के कारण हैं। इसलिए सांख्यवादी सृष्टि के मूल कारण के संबंध में वेदांत के निष्कर्ष के विरुद्ध हैं।

वास्तव में, परम पूर्ण आध्यात्मिक आत्मा हर तरह की अभिव्यक्ति का कारण है, और वह हमेशा पूर्ण होता है, ऊर्जा के रूप में और ऊर्जावान के रूप में भी। सृष्टि सर्वोच्च पूर्ण व्यक्ति की ऊर्जा के कारण है, जिसमें सभी ऊर्जाएँ संरक्षित हैं। जो दार्शनिक व्यक्तिपरक रूप से सृष्टि में लगे हुए हैं, वे केवल पदार्थ की अद्भुत ऊर्जाओं की प्रशंसा कर सकते हैं। ऐसे दार्शनिक ईश्वर की अवधारणा को केवल भौतिक ऊर्जा के उत्पाद के रूप में स्वीकार करते हैं। उनके निष्कर्षों के अनुसार, ऊर्जा का स्रोत भी ऊर्जा का ही एक उत्पाद है। ऐसे दार्शनिक गलत तरीके से देखते हैं कि सृष्टि के भीतर जीवित प्राणी भौतिक ऊर्जा के कारण हैं, और वे सोचते हैं कि सर्वोच्च पूर्ण चेतन प्राणी उसी प्रकार भौतिक ऊर्जा का एक उत्पाद होना चाहिए।

चूँकि भौतिकवादी विचारक और वैज्ञानिक अपनी अपूर्ण इंद्रियों में बहुत अधिक तल्लीन रहते हैं, इसलिए वे स्वाभाविक रूप से यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जीवंत शक्ति भौतिक संयोजन का एक उत्पाद है। लेकिन वास्तविक तथ्य इसके बिलकुल विपरीत है। आत्मा भौतिकता का एक उत्पाद है। भगवद् गीता के अनुसार, परमात्मा, भगवान का व्यक्तित्व, सभी ऊर्जाओं का स्रोत है। जब कोई अंतरिक्ष और समय की सीमाओं के भीतर एक सीमित पदार्थ का अध्ययन करके शोध कार्य में आगे बढ़ता है, तो वह विभिन्न अद्भुत ब्रह्मांडीय अभिव्यक्तियों से चकित हो जाता है और स्वाभाविक रूप से सम्मोहित होकर शोध कार्य का मार्ग या प्रेरणा विधि को स्वीकार करता रहता है। हालाँकि, समझने के निगमनात्मक तरीके के माध्यम से, कोई परम पूर्ण व्यक्ति, भगवान के व्यक्तित्व को सभी कारणों के कारण के रूप में स्वीकार करता है, जो विविध ऊर्जाओं से भरा है और जो न तो अवैयक्तिक है और न ही शून्य है। परम व्यक्ति की अवैयक्तिक अभिव्यक्ति उसकी ऊर्जा का एक और प्रदर्शन है। इसलिए यह निष्कर्ष कि पदार्थ सृजन का मूल कारण है, वास्तविक सत्य से पूरी तरह अलग है। भौतिक अभिव्यक्ति भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की नज़र से हुई है, जो अविश्वसनीय रूप से शक्तिशाली है। भौतिक प्रकृति सर्वोच्च अधिकार द्वारा विद्युतीकृत है, और समय और स्थान की सीमा के भीतर, सशर्त आत्मा भौतिक अभिव्यक्ति के प्रति विस्मय से फँसी हुई है। दूसरे शब्दों में, परम व्यक्तित्व भगवान वास्तव में उसकी भौतिक ऊर्जा की अभिव्यक्तियों के माध्यम से एक भौतिकवादी दार्शनिक और वैज्ञानिक की दृष्टि में साकार होते हैं। जो व्यक्ति ऊर्जा के स्रोत और ऊर्जा के बीच संबंध को न जानने के कारण भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की शक्ति या उनकी विविध ऊर्जाओं को नहीं समझता है, उसके लिए हमेशा त्रुटि का मौका होता है, जिसे विवर्त के रूप में जाना जाता है। जब तक भौतिकवादी वैज्ञानिक और दार्शनिक सही निष्कर्ष पर नहीं पहुँचते, निश्चित रूप से वे भौतिक क्षेत्र से ऊपर मँडराते रहेंगे, परम सत्य की उचित समझ से वंचित रहेंगे।

महान वैष्णव दार्शनिक श्रील बलदेव विद्याभूषण ने वेदांत-सूत्र पर एक टिप्पणी, अपने गोविंद-भाष्य में भौतिकवादी निष्कर्ष को बहुत अच्छी तरह से समझाया है। वे निम्नानुसार लिखते हैं:

"साँख्य दार्शनिक कपिल ने अपनी राय के अनुसार विभिन्न प्राथमिक सत्यों को जोड़ा है। उनके अनुसार, भौतिक प्रकृति तीन भौतिक गुणों - अच्छाई, जुनून और अज्ञानता - के संतुलन से मिलकर बनी है। भौतिक प्रकृति भौतिक ऊर्जा का उत्पादन करती है, जिसे महत के रूप में जाना जाता है, और महत मिथ्या अहंकार का उत्पादन करता है। अहंकार इंद्रिय बोध की पाँच वस्तुओं का उत्पादन करता है, जो दस इंद्रियों (ज्ञान प्राप्त करने के लिए पाँच और काम करने के लिए पाँच), मन और पाँच स्थूल तत्वों का उत्पादन करती हैं। पुरुष या उपभोक्ता को इन चौबीस तत्वों के साथ गिनने पर, पच्चीस अलग-अलग सत्य होते हैं। इन पच्चीस प्रारंभिक सत्यों के अप्रकट चरण को प्रकृति या भौतिक प्रकृति कहा जाता है। भौतिक गुण तीन अलग-अलग चरणों में सहयोग कर सकते हैं, जैसे कि सुख का कारण, संकट का कारण और भ्रम का कारण। अच्छाई का गुण भौतिक सुख का कारण है, जुनून का गुण भौतिक संकट का कारण है, और अज्ञानता का गुण भ्रम का कारण है। हमारा भौतिक अनुभव सुख, संकट और भ्रम की इन तीन अभिव्यक्तियों की सीमाओं के भीतर निहित है। उदाहरण के लिए, एक सुंदर महिला निश्चित रूप से उस व्यक्ति के लिए भौतिक सुख का कारण होती है जो उसे एक पत्नी के रूप में रखता है, लेकिन वही सुंदर महिला उस आदमी के लिए संकट का कारण बनती है जिसे वह अस्वीकार कर देती है या जो उसके क्रोध का कारण होता है, और यदि वह किसी आदमी को छोड़ देती है तो वह बन जाती है भ्रम का कारण।

"इंद्रियाँ दो प्रकार की हैं, दस बाहरी इंद्रियाँ और एक आंतरिक इंद्रिय, मन। इस प्रकार इंद्रियाँ ग्यारह हैं। कपिल के अनुसार, भौतिक प्रकृति शाश्वत और सर्वशक्तिशाली है। मूल रूप से कोई आत्मा नहीं है, और पदार्थ का कोई कारण नहीं है। पदार्थ स्वयं ही हर चीज़ का मुख्य कारण है। यह सभी कारणों का सर्वव्यापी कारण है। सांख्य दर्शन कुल ऊर्जा (महत-तत्व), झूठे अहंकार और इंद्रिय धारणा की पाँच वस्तुओं को भौतिक प्रकृति की सात विविध अभिव्यक्तियों के रूप में मानता है, जिसमें भौतिक कारण और दक्ष कारण के रूप में जानी जाने वाली दो विशेषताएँ होती हैं। पुरुष, उपभोक्ता, बिना रूपांतरण के है, जबकि भौतिक प्रकृति हमेशा परिवर्तन के अधीन है। लेकिन हालांकि भौतिक प्रकृति निष्क्रिय है, यह कई जीवित प्राणियों के लिए आनंद और मोक्ष का कारण है। इसकी गतिविधियाँ इंद्रिय धारणा की अवधारणा से परे हैं, लेकिन फिर भी कोई बेहतर बुद्धि से उनका अनुमान लगा सकता है। भौतिक प्रकृति एक है, लेकिन तीन गुणों की परस्पर क्रिया के कारण, यह कुल ऊर्जा और अद्भुत ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति का उत्पादन कर सकती है। इस तरह के परिवर्तन भौतिक प्रकृति को दो विशेषताओं, अर्थात् दक्ष और भौतिक कारणों में विभाजित करते हैं। पुरुष, उपभोक्ता, निष्क्रिय है और भौतिक गुणों के बिना है, हालाँकि उसी समय वह ज्ञान के प्रतीक के रूप में प्रत्येक और हर शरीर में अलग-अलग रूप में मौजूद है। भौतिक कारण को समझकर, कोई यह अनुमान लगा सकता है कि पुरुष, उपभोक्ता, बिना गतिविधि के होने के कारण, सभी प्रकार के आनंद या अधीक्षण से परे है। सांख्य दर्शन, प्रकृति (भौतिक प्रकृति) और पुरुष (उपभोक्ता) की प्रकृति का वर्णन करने के बाद, यह दावा करता है कि सृष्टि केवल उनके एकीकरण का या एक दूसरे के निकटता का एक उत्पाद है। इस तरह के एकीकरण के साथ जीवित लक्षण भौतिक प्रकृति में दिखाई देते हैं, लेकिन कोई यह अनुमान लगा सकता है कि उपभोक्ता, पुरुष के व्यक्ति में, नियंत्रण और आनंद की शक्तियाँ हैं। जब पर्याप्त ज्ञान की कमी के कारण पुरुष को भ्रम होता है, तो वह खुद को उपभोक्ता महसूस करता है, और जब वह पूर्ण ज्ञान में होता है तो वह मुक्त हो जाता है। सांख्य दर्शन में पुरुष को प्रकृति की गतिविधियों के प्रति हमेशा उदासीन बताया गया है।

"सांख्य दार्शनिक तीन प्रकार के प्रमाणों को स्वीकार करते हैं, जैसे प्रत्यक्ष धारणा, परिकल्पना और पारंपरिक प्राधिकरण। जब ऐसा प्रमाण पूर्ण होता है, तो सब कुछ उत्तम होता है। तुलना की प्रक्रिया ऐसी पूर्णता के भीतर है। ऐसे साक्ष्य से परे कोई प्रमाण नहीं है। प्रत्यक्ष धारणा प्रमाण या अधिकृत पारंपरिक साक्ष्य के बारे में बहुत अधिक विवाद नहीं है। सांख्य दर्शन की प्रणाली ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति के कारणों के रूप में तीन प्रकार की प्रक्रियाओं की पहचान करती है - अर्थात् परिणमात (रूपांतरण), समन्वयात (समायोजन) और शक्तिताः (ऊर्जाओं का प्रदर्शन)।"

वेदांत-सूत्र पर अपनी टिप्पणी में, श्रील बलदेव विद्याभूषण ने इस निष्कर्ष को निरस्त करने का प्रयास किया है क्योंकि उनका मानना है कि कॉस्मिक अभिव्यक्ति के इन तथाकथित कारणों को बदनाम करने से संपूर्ण सांख्य दर्शन शून्य हो जाएगा। भौतिकवादी दार्शनिक पदार्थ को सृष्टि का भौतिक और दक्ष कारण मानते हैं; उनके लिए, पदार्थ हर प्रकार की अभिव्यक्ति का कारण है। आम तौर पर वे पानी के बर्तन और मिट्टी का उदाहरण देते हैं। मिट्टी पानी के बर्तन का कारण है, लेकिन मिट्टी को कारण और प्रभाव दोनों के रूप में पाया जा सकता है। पानी का बर्तन प्रभाव है और मिट्टी स्वयं कारण है, लेकिन मिट्टी हर जगह दिखाई देती है। एक पेड़ पदार्थ है, लेकिन एक पेड़ फल पैदा करता है। पानी पदार्थ है, लेकिन पानी बहता है। इस तरह से, सांख्यकार कहते हैं, पदार्थ गति और उत्पादन का कारण है। जैसे, ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति में हर चीज के भौतिक और दक्ष कारण के रूप में पदार्थ पर विचार किया जा सकता है। श्रील बलदेव विद्याभूषण ने इसलिए प्रधान की प्रकृति का उल्लेख इस प्रकार किया है:

"भौतिक प्रकृति जड़ है, और इस रूप में यह पदार्थ का कारण नहीं हो सकती, न तो भौतिक रूप से और न ही प्रभावी कारण के रूप में। ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति की अद्भुत व्यवस्था और प्रबंधन को देखना आमतौर पर यह सुझाव देता है कि इस व्यवस्था के पीछे एक जीवित मस्तिष्क है, क्योंकि बिना जीवित मस्तिष्क के ऐसी व्यवस्था मौजूद नहीं हो सकती। किसी को यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि ऐसी व्यवस्था बिना सचेत निर्देश के मौजूद हो सकती है। अपने व्यावहारिक अनुभव में हम कभी नहीं देखते कि जड़ ईंटें स्वयं एक बड़ी इमारत का निर्माण कर सकती हैं।

"जलकुंभ का उदाहरण स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि एक जलकुंभ को सुख और कष्ट का कोई ज्ञान नहीं होता है। ऐसी धारणा भीतर होती है। इसलिए ढकने वाला शरीर, या जलकुंभ, उसके साथ समन्वयित नहीं किया जा सकता है।

"कभी-कभी भौतिक वैज्ञानिक यह सुझाव देते हैं कि पेड़ एक माली की सहायता के बिना पृथ्वी से स्वतः ही उगते हैं, क्योंकि वह पदार्थ की एक प्रवृत्ति है। वे जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवित प्राणियों के अंतर्ज्ञान को भी भौतिक मानते हैं। लेकिन शारीरिक अंतर्ज्ञान जैसी भौतिक प्रवृत्तियों को स्वतंत्र रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वे शरीर के भीतर एक आत्मा आत्मा के अस्तित्व का सुझाव देते हैं। वास्तव में, न तो पेड़ और न ही किसी जीवित प्राणी के शरीर में कोई प्रवृत्ति या अंतर्ज्ञान है; प्रवृत्ति और अंतर्ज्ञान इसलिए मौजूद है क्योंकि शरीर के भीतर आत्मा मौजूद है। इस संबंध में, एक कार और ड्राइवर का उदाहरण बहुत लाभदायक रूप से दिया जा सकता है। कार में दाएं और बाएं मुड़ने की प्रवृत्ति होती है, लेकिन कोई यह नहीं कह सकता कि कार स्वयं, पदार्थ के रूप में, ड्राइवर के निर्देश के बिना दाएं और बाएं मुड़ जाती है। एक भौतिक कार में कार के भीतर ड्राइवर के इरादों से स्वतंत्र न तो प्रवृत्ति होती है और न ही अंतर्ज्ञान। जंगल में पेड़ों की स्वचालित वृद्धि के लिए भी यही सिद्धांत लागू होता है। वृद्धि पेड़ के भीतर आत्मा की उपस्थिति के कारण होती है।

"कभी-कभी मूर्ख लोग इसे मान लेते हैं कि क्योंकि बिच्छू चावल के ढेर से पैदा होते हैं, इसलिए चावल ने बिच्छू पैदा किए हैं। हालाँकि, वास्तविक तथ्य यह है कि माँ बिच्छू चावल के भीतर अंडे देती है और चावल के समुचित किण्वन द्वारा अंडे कई बच्चे के बिच्छुओं को जन्म देते हैं, जो नियत समय आने पर बाहर आते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि चावल बिच्छू को जन्म देते हैं। इसी तरह, कभी-कभी गंदे बिस्तरों से कीड़े निकलते दिखाई देते हैं। हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं है कि बिस्तर कीड़े को जन्म देते हैं। यह जीवित आत्मा है जो बिस्तर की गंदी स्थिति का लाभ उठाकर सामने आती है। अलग-अलग प्रकार के जीवित प्राणी हैं। उनमें से कुछ भ्रूण से आते हैं, कुछ अंडों से और कुछ पसीने के किण्वन से। विभिन्न जीवित प्राणियों में प्रकट होने के अलग-अलग स्रोत होते हैं, लेकिन किसी को यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि पदार्थ ऐसे जीवित प्राणियों को पैदा करता है।

भौतिकवादियों द्वारा उद्धृत उदाहरण कि पेड़ स्वचालित रूप से पृथ्वी से आते हैं, उसी सिद्धांत का पालन करते हैं। एक निश्चित स्थिति का लाभ उठाकर, एक जीवित प्राणी पृथ्वी से आता है। बृहद-आरण्यक उपनिषद के अनुसार, हर जीवित प्राणी को अपने पिछले कर्मों के अनुसार एक निश्चित प्रकार का शरीर लेने के लिए दैवीय अधीक्षण के द्वारा मजबूर किया जाता है। शरीर की कई किस्में हैं, और एक दैवीय व्यवस्था के कारण एक जीवित प्राणी विभिन्न आकारों के शरीर लेता है।

"जब कोई व्यक्ति सोचता है 'मैं यह कर रहा हूँ,' तो 'मैं हूँ' शरीर को संदर्भित नहीं करता है। यह शरीर से अधिक या शरीर के भीतर किसी चीज़ को संदर्भित करता है। जैसे, शरीर जैसा है, उसके पास न तो प्रवृत्ति है और न ही अंतर्ज्ञान; प्रवृत्तियाँ और अंतर्ज्ञान शरीर के भीतर आत्मा के हैं। भौतिक वैज्ञानिक कभी-कभी सुझाव देते हैं कि नर और मादा शरीर की प्रवृत्तियाँ उनके मिलन का कारण बनती हैं और यह बच्चे के जन्म का कारण है। लेकिन चूंकि सांख्य दर्शन के अनुसार, पुरुष हमेशा अप्रभावित रहता है, इसलिए जन्म देने की प्रवृत्ति कहां से आती है?

"कभी-कभी भौतिक विज्ञानी यह उदाहरण देते हैं कि दूध अपने आप ही दही में बदल जाता है और बादलों से बरसने वाला आसुत जल पृथ्वी पर गिरकर विभिन्न प्रकार के पेड़ों को जन्म देता है और विभिन्न प्रकार के फूलों और फलों में प्रवेश करता है जिनकी महक और स्वाद अलग-अलग होते हैं। इसलिए, उनका कहना है कि पदार्थ अपने आप ही विभिन्न प्रकार की भौतिक चीजों का निर्माण करता है। इस तर्क के जवाब में, बृहदारण्यक उपनिषद का वही प्रस्ताव दोहराया जाता है - कि विभिन्न प्रकार के जीवों को एक श्रेष्ठ शक्ति के प्रबंधन द्वारा विभिन्न प्रकार के शरीरों में डाला जाता है। श्रेष्ठ निरीक्षण के अंतर्गत, उनके पिछले कर्मों के अनुसार विभिन्न आत्माओं को एक विशेष प्रकार का शरीर प्राप्त करने का मौका दिया जाता है, जैसे कि पेड़, जानवर, पक्षी या जानवर, और इस प्रकार इन परिस्थितियों में उनकी अलग-अलग प्रवृत्तियाँ विकसित होती हैं। भगवद्-गीता (13.22) भी आगे इस बात की पुष्टि करती है:

पुरुषः प्रकृति-स्थो हि भुङ्क्ते प्रकृति-जान् गुणान्

कारणं गुण-सङ्गोऽस्य सदसद्योनि-जन्मसु

'इस प्रकार भौतिक प्रकृति में जीवात्मा जीवन के तरीकों का पालन करता है, प्रकृति के तीन गुणों का आनंद लेता है। यह उस भौतिक प्रकृति से उसके जुड़ाव के कारण है। इस प्रकार वह विभिन्न प्रजातियों में अच्छे और बुरे से मिलता है।' आत्मा को अलग-अलग प्रकार के शरीर दिए जाते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आत्माओं को विभिन्न प्रकार के पेड़ के शरीर नहीं दिए जाते, तो विभिन्न प्रकार के फल और फूल उत्पन्न नहीं हो सकते। पेड़ों का प्रत्येक वर्ग एक विशेष प्रकार का फल और फूल पैदा करता है; ऐसा नहीं है कि विभिन्न वर्गों के बीच कोई अंतर नहीं है। एक व्यक्तिगत पेड़ अलग-अलग रंगों के फूल या अलग-अलग स्वाद के फल नहीं देता है। सीमांकित वर्ग हैं, जैसा कि हम उन्हें मनुष्यों, जानवरों, पक्षियों और अन्य प्रजातियों के बीच पाते हैं। असंख्य जीवित संस्थाएँ हैं, और भौतिक प्रकृति के विभिन्न गुणों के अनुसार भौतिक दुनिया में की गई उनकी गतिविधियाँ, उन्हें विभिन्न प्रकार के जीवन जीने का मौका देती हैं।

"इस प्रकार किसी को समझना चाहिए कि प्राधान, पदार्थ, जीवित प्राणी द्वारा प्रेरित हुए बिना कार्य नहीं कर सकता है। भौतिकवादी सिद्धांत कि पदार्थ स्वतंत्र रूप से कार्य करता है, इसलिए उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है। पदार्थ को प्रकृति कहा जाता है, जो स्त्री ऊर्जा को संदर्भित करता है। एक महिला प्राकृत है, एक महिला। एक महिला एक पुरुष, एक पुरुष के सहयोग के बिना बच्चे को जन्म नहीं दे सकती है। पुरुष बच्चे के जन्म का कारण बनता है क्योंकि पुरुष आत्मा को, जो वीर्य में आश्रय करती है, स्त्री के गर्भ में डालता है। स्त्री, भौतिक कारण के रूप में, आत्मा को शरीर प्रदान करती है, और दक्ष कारण के रूप में वह बच्चे को जन्म देती है। लेकिन हालांकि स्त्री बच्चे के जन्म का भौतिक और कुशल कारण प्रतीत होती है, मूल रूप से पुरुष, पुरुष, बच्चे का कारण है। इसी तरह, यह भौतिक संसार ब्रह्मांड के भीतर गर्भोदकशायी विष्णु के प्रवेश के कारण विभिन्न प्रकार की अभिव्यक्तियों को जन्म देता है। वह न केवल ब्रह्मांड के भीतर बल्कि सभी जीवों के शरीर में, साथ ही परमाणु के भीतर भी विद्यमान है। हम ब्रह्म-संहिता से समझते हैं कि परमात्मा ब्रह्मांड के भीतर, परमाणु के भीतर और प्रत्येक जीवित प्राणी के हृदय के भीतर विद्यमान है। इसलिए यह सिद्धांत कि पदार्थ पूरे ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति का कारण है, पदार्थ और आत्मा के पर्याप्त ज्ञान वाले किसी भी व्यक्ति द्वारा स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

“भौतिकवादी कभी-कभी तर्क दिया करते हैं कि जैसे गाय द्वारा खाए गए भूसे से दूध स्वतः बन जाता है, उसी तरह भौतिक प्रकृति, विभिन्न परिस्थितियों में, विविध प्रकार की अभिव्यक्तियों को जन्म देती है। इस प्रकार, मूल रूप से पदार्थ ही कारण है। इस तर्क का खंडन करते हुए, हम कह सकते हैं कि गाय के समान प्रजाति का एक पशु - अर्थात, बैल - भी गाय की तरह भूसा खाता है लेकिन दूध नहीं बनाता है। परिस्थितियों में, यह नहीं कहा जा सकता कि किसी विशेष प्रजाति के संयोग से भूसा दूध पैदा करता है। निष्कर्ष यह होना चाहिए कि श्रेष्ठ प्रबंधन है, जैसा कि भगवद्-गीता (9.10) में पुष्टि की गई है, जहां भगवान कहते हैं, मायाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते स चराचरम: 'हे कुन्ती के पुत्र, यह भौतिक प्रकृति मेरे निर्देशन में कार्य कर रही है और यह सभी चल और अचल प्राणियों को पैदा कर रही है।' सर्वोच्च भगवान कहते हैं, मायाध्यक्षेण ('मेरे अधीक्षण में')। जब वह चाहता है कि गाय भूसा खाकर दूध पैदा करे, तो दूध होता है, और जब वह ऐसा नहीं चाहता है, तो ऐसे भूसे का मिश्रण दूध का उत्पादन नहीं कर सकता है। यदि भौतिक प्रकृति का तरीका वैसा ही होता कि भूसा दूध का उत्पादन करता है, तो भूसे का ढेर भी दूध का उत्पादन कर सकता है। लेकिन वह संभव नहीं है। और वही भूसा जो एक मानव महिला को दिया जाता है, वह भी दूध का उत्पादन नहीं कर सकता है। भगवद्-गीता के कथन का यही अर्थ है कि केवल श्रेष्ठ आदेशों के अधीन ही कुछ भी घटित होता है। पदार्थ में स्वतंत्र रूप से उत्पादन करने की शक्ति ही नहीं है। इसलिए, निष्कर्ष यह है कि पदार्थ, जिसे स्वयं का ज्ञान नहीं है, भौतिक सृष्टि का कारण नहीं हो सकता। परम निर्माता भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व है।

"यदि पदार्थ को सृष्टि का मूल कारण माना जाता, तो दुनिया के सभी अधिकृत शास्त्र बेकार हो जाएँगे, क्योंकि हर शास्त्र में, विशेष रूप से मनु-स्मृति जैसे वैदिक शास्त्रों में, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को परम निर्माता कहा गया है। मनु-स्मृति को मानवता को उच्चतम वैदिक निर्देश माना जाता है। मनु मानव जाति को कानून देने वाले हैं, और मनु-स्मृति में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सृष्टि से पहले पूरा ब्रह्मांडीय अंतरिक्ष अंधकारमय था, बिना जानकारी और विविधता के, और वह पूरी तरह से निलंबन की स्थिति में था, सपने की तरह। सब कुछ अंधेरा था। तब भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व ने ब्रह्मांडीय अंतरिक्ष में प्रवेश किया, और यद्यपि वह अदृश्य हैं, उन्होंने दृश्य ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति का निर्माण किया। भौतिक दुनिया में सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान अपनी व्यक्तिगत उपस्थिति से प्रकट नहीं होते हैं, लेकिन विभिन्न किस्मों में ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि सब कुछ उनके निर्देशन में बनाया गया है। उन्होंने सभी रचनात्मक शक्तियों के साथ ब्रह्मांड में प्रवेश किया, और इस तरह उन्होंने असीमित अंतरिक्ष के अंधेरे को हटा दिया।

"भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का रूप दिव्य, बहुत सूक्ष्म, शाश्वत, सर्व-व्यापी, अकल्पनीय और इसलिए एक शर्त वाले जीवित प्राणी की भौतिक इंद्रियों से अप्रकट बताया गया है। उन्होंने स्वयं को कई जीवित संस्थाओं में विस्तारित करने की इच्छा की, और ऐसी इच्छा के साथ उन्होंने पहले ब्रह्मांडीय अंतरिक्ष के भीतर पानी का एक विशाल विस्तार बनाया और फिर उस पानी को जीवित संस्थाओं से भर दिया। उस संसर्ग की प्रक्रिया से एक विशाल शरीर प्रकट हुआ, जो एक हजार सूर्यों की तरह धधक रहा था, और उस शरीर में पहला रचनात्मक सिद्धांत, ब्रह्मा था। महान पराशर ऋषि ने विष्णु पुराण में इसकी पुष्टि की है। उनका कहना है कि हमारे लिए दृश्यमान ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति भगवान विष्णु से उत्पन्न होती है और उनकी सुरक्षा में बनी रहती है। वे सार्वभौमिक रूप के प्रमुख संधारक और विध्वंसक हैं।

"यह ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की विविध ऊर्जाओं में से एक है। जैसे एक मकड़ी लार का स्राव करती है और अपनी गतिविधियों से एक जाल बुनती है, लेकिन अंत में अपने शरीर के भीतर जाल को हवा में उड़ा देती है, इसलिए भगवान विष्णु अपने दिव्य शरीर से इस ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति का निर्माण करते हैं और अंत में इसे अपने भीतर समेट लेते हैं। वैदिक समझ के सभी महान ऋषियों ने स्वीकार किया है कि भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व मूल निर्माता है।

"कभी-कभी यह दावा किया जाता है कि महान दार्शनिकों का अप्रामाणिक अनुमान धार्मिक कर्मकांड के सिद्धांतों के बिना ही ज्ञान की उन्नति के लिए होता है। परन्तु धार्मिक कर्मकांड के सिद्धांत दरअसल आध्यात्मिक ज्ञान की उन्नति के लिए ही होते हैं। धार्मिक कर्मकांड को करने से अंततः ज्ञान की आखिरी मंज़िल उस वासुदेव, ईश्वर के परम व्यक्तित्व को समझकर तय होती है जो हर चीज की वजह है। भगवद्गीता में यह साफ़ तौर पर कहा गया है कि जो लोग भी सिर्फ़ ज्ञान के प्रचारक हैं, बिना किसी धार्मिक कर्मकांड क्रियाओं के, वह बहुत जन्मों के अनुमान के बाद ज्ञान में आगे बढ़ते हैं और आखिरकार इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि वासुदेव ही हर उस चीज़ का परम कारण है। जीवन के इस लक्ष्य को पाने के परिणामस्वरूप, इतने तरक्की-याफ्ता और पढ़े-लिखे ज्ञाता या दार्शनिक ईश्वर के परम व्यक्तित्व के सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं। धार्मिक कर्मकांड के कार्य दरअसल भौतिक संसार में भ्रष्ट हुए दिमाग को साफ़ करने के लिए होते हैं और कलयुग के इस ज़माने की खास बात यह है कि सिर्फ़ भगवान के नामों - हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का नाम जप करके आसानी से भ्रष्ट हुए दिमाग को साफ़ किया जा सकता है।

"एक वैदिक आज्ञा कहती है, सर्वे वेदा यत् पदम आमनन्ति (कठ उप. 1.2.15): सारा वैदिक ज्ञान ईश्वर के परम व्यक्तित्व की खोज है। उसी तरह, एक और वैदिक आज्ञा कहती है, नारायणपरा वेदः: वेद नारायण, परम स्वामी को समझने के लिए हैं। उसी तरह, भगवद्गीता भी पुष्टि करती है, वेदईश च सर्वैर अहम् एव वेद्यः: सारे वेदों में, कृष्ण को ही जाना जाना है। इसलिए, वेदों को समझने, वैदिक बलिदान करने और वेदांत-सूत्र पर अनुमान लगाने का मुख्य उद्देश्य कृष्ण को समझना है। ईश्वर के परम व्यक्तित्व के ना-होने या ख़ालीपन के प्रति अवैयक्तिक दृष्टिकोण को स्वीकार करना वेदों के सारे अध्ययन से इंकार करना है। निजी अनुमान वेदों के निष्कर्ष को गलत साबित करने के उद्देश्य से हैं। इसलिए किसी भी निजी अनुमान प्रस्तुति को वेदों के सिद्धांतों या मानक शास्त्रों के ख़िलाफ़ समझा जाना चाहिए। जब से निजीवादी लोगों का अनुमान वेदों के सिद्धांतों का पालन नहीं करता है, उनके निष्कर्ष को वैदिक सिद्धांतों के ख़िलाफ माना जाना चाहिए। किसी भी चीज को वैदिक सिद्धांतों का समर्थन नहीं मिलता उसे काल्पनिक और मानक प्रमाण की कमी वाला समझा जाना चाहिए। इसलिए वैदिक साहित्य की किसी भी निजीवादी व्याख्या को स्वीकार नहीं किया जा सकता।'

"अगर कोई अनधिकृत धर्मग्रंथ या कथित धर्मग्रंथ स्वीकार कर वेदों के निष्कर्षों को रद्द करने का प्रयास करता है, तो परम सत्य के बारे में सही निष्कर्ष तक पहुंचना उसके लिए बहुत कठिन होगा। दो विरोधाभासी धर्मग्रंथों को समायोजित करने की प्रणाली वेदों को संदर्भित करना है, क्योंकि वेदों के संदर्भ अंतिम निर्णय के रूप में स्वीकार किए जाते हैं। जब हम किसी विशेष धर्मग्रंथ का संदर्भ लेते हैं, तो उसे अधिकृत होना चाहिए, और इस अधिकार के लिए उसे वैदिक आदेशों का सख्ती से पालन करना चाहिए। यदि कोई एक वैकल्पिक सिद्धांत प्रस्तुत करता है जिसे उसने स्वयं गढ़ा है, तो वह सिद्धांत स्वयं को बेकार साबित करेगा, क्योंकि कोई भी सिद्धांत जो यह साबित करने का प्रयास करता है कि वैदिक प्रमाण का कोई अर्थ नहीं है, तुरंत स्वयं को अर्थहीन साबित करता है। वेदों के अनुयायी सर्वसम्मति से शिष्य परंपरा में मनु और पराशर के अधिकार को स्वीकार करते हैं। हालाँकि, उनके कथन नास्तिक कपिल का समर्थन नहीं करते हैं, क्योंकि वेदों में उल्लिखित कपिल एक अलग कपिल है, जो कर्दम और देवहूति का पुत्र है। नास्तिक कपिल अग्नि के वंश का वंशज है और बाध्य आत्माओं में से एक है। लेकिन जो कपिल कर्दम मुनि का पुत्र है, उसे वासुदेव के अवतार के रूप में स्वीकार किया जाता है। पद्म पुराण इस बात का प्रमाण देता है कि भगवान वासुदेव कपिल के अवतार में जन्म लेते हैं, और उनके नास्तिक सांख्य दर्शन के विस्तार से, सभी देवताओं और आसुरी नामक एक ब्राह्मण को सिखाया। नास्तिक कपिल के सिद्धांत में वैदिक सिद्धांतों के विरुद्ध कई कथन हैं। नास्तिक कपिल भगवान को स्वीकार नहीं करता है। वह कहता है कि जीव स्वयं सर्वोपरि भगवान है और कोई भी उससे बड़ा नहीं है। बाध्य और मुक्त जीवन की उसकी अवधारणाएँ भौतिकवादी हैं, और वह अमर समय के महत्व को स्वीकार करने से इनकार करता है। इस तरह के सभी कथन वेदांत-सूत्र के सिद्धांतों के विरुद्ध हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)