श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 6: श्रीअद्वैत आचार्य की महिमाएँ अध्याय सात  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  1.6.115 
अद्वैत - महिमा अनन्त के पारे कहिते ।
सेइ लिखि, येइ शुनि महाजन हैते ॥115॥
 
 
अनुवाद
अद्वैत आचार्य की असीम महिमा का वर्णन कौन कर सकता है? मैंने महान् विद्वानों से जितना जाना है, उतना ही यहाँ लिख रहा हूँ।
 
Who can describe the infinite glories of Advaita Acharya? Here I am writing only what I have learned from great men.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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