श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 6: श्रीअद्वैत आचार्य की महिमाएँ अध्याय सात  »  श्लोक 113
 
 
श्लोक  1.6.113 
अद्वैत - आचार्य गोसाञि र महिमा अपार ।
याँहार हुङ्कारे कैल चैतन्यावतार ॥113॥
 
 
अनुवाद
श्री अद्वैत आचार्य की महिमा असीम है, क्योंकि उनके निष्कपट स्पंदनों के कारण ही भगवान चैतन्य इस पृथ्वी पर अवतरित हुए।
 
The glories of Sri Advaita Acharya are immense, because it was only due to his devoted roar that Lord Sri Chaitanya could descend on this earth.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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