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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 6: श्रीअद्वैत आचार्य की महिमाएँ अध्याय सात  »  श्लोक 112
 
 
श्लोक  1.6.112 
मूल भक्त - अवतार श्री - सङ्कर्षण ।
भक्त - अवतार तँहि अद्वैते गणन ॥112॥
 
 
अनुवाद
मूल भक्त अवतार संकर्षण है। श्रीअद्वैत को ऐसे अवतारों में गिना जाता है।
 
The original incarnation of a devotee is Sankarshana. Sri Advaita is counted among such incarnations.
तात्पर्य
यद्यपि श्री अध्वैत प्रभु विष्णु के वर्ग के होते हुए भी, वे श्री चैतन्य महाप्रभु की सहचरियों में से एक के रूप में सेवा-भाव रखते हैं। जब भगवान विष्णु सर्वकारी के रूप में प्रकट होते हैं, तो उन्हें भगवान कृष्ण के भक्त के अवतार कहा जाता है। श्री सँकर्शण, जो आध्यात्मिक आकाश में, जिसे बृहद वैकुंठ के रूप में जाना जाता है, की प्रधान चतुर्धार अवतार है और भक्त के मूल अवतार हैं। भगवान महाविष्णु, जो कारण समुद्र में लेटे हुए हैं, संगर्षण की अभिव्यक्ति हैं। वह भगवान के मूल व्यक्तित्व हैं जो लौकिक अभिव्यक्ति के भौतिक और सक्षम कारणों को देखते हैं। अध्वैत प्रभु को महाविष्णु के अवतार के रूप में स्वीकार किया जाता है। संगर्षण के सभी पूर्ण अभिव्यक्ति भगवान कृष्ण के अप्रत्यक्ष विस्तार हैं। वह विचार भी अध्वैत प्रभु को गौरा कृष्ण का एक शाश्वत सेवक बनाता है। इसलिए उन्हें एक भक्त अवतार के रूप में स्वीकार किया जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)