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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 6: श्रीअद्वैत आचार्य की महिमाएँ अध्याय सात  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  1.6.110 
नाना - भक्त - भावे करेन स्व - माधुर्य पान ।
पूर्व करियाछि एइ सिद्धान्त व्याख्यान ॥110॥
 
 
अनुवाद
भक्त के विविध भावों के माध्यम से वे अपनी मधुरता का आस्वादन करते हैं। इस निष्कर्ष को मैं पहले ही स्पष्ट कर चुका हूँ।
 
He savors His sweetness through the various emotions of the devotee. I have already explained this principle.
तात्पर्य
भगवान चैतन्य, जिन्हें श्री गौरहरी के रूप में जाना जाता है, सभी विभिन्न रसों, अर्थात् तटस्थता, दासता, भ्रातृत्व, माता-पिता का स्नेह और वैवाहिक प्रेम का अनुभव करने में पूर्ण हैं। भक्तों के विभिन्न ग्रेड के आनंद को स्वीकार करके, वह इन रिश्तों के सभी आनंदों को पाने में पूर्ण हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)