भक्त - भाव अङ्गीकरि’ बलराम, लक्ष्मण ।
अद्वैत, नित्यानन्द, शेष, सङ्कर्षण ॥105॥
कृष्णेर माधुर्य - रसामृत करे पान ।
सेइ सुखे मत्त, किछु नाहि जाने आन ॥106॥
अनुवाद
बलदेव, लक्ष्मण, अद्वैत आचार्य, भगवान नित्यानन्द, भगवान शेष और भगवान संकर्षण स्वयं को भगवान कृष्ण के भक्त और सेवक मानकर उनके दिव्य आनंद के अमृतमय रस का आस्वादन करते हैं। वे सभी उस आनंद में उन्मत्त हैं, और उन्हें इसके अतिरिक्त कुछ भी ज्ञात नहीं है।
Baladeva, Lakshmana, Advaita Acharya, Lord Nityananda, Lord Sesha, and Sankarshana, considering themselves devotees and servants of the Lord, taste the nectar of Lord Krishna's transcendental bliss. They are all intoxicated with this bliss and know nothing else.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥