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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 6: श्रीअद्वैत आचार्य की महिमाएँ अध्याय सात  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  1.6.100 
कृष्णेर समता हैते बड़े भक्त - पद ।
आत्मा हैते कृष्णेर भक्त हय प्रेमास्पद ॥100॥
 
 
अनुवाद
भक्त होने का स्थान भगवान कृष्ण के समतुल्य होने से भी अधिक ऊँचा है, क्योंकि भक्त भगवान कृष्ण को स्वयं से भी अधिक प्रिय हैं।
 
Being a devotee is greater than being equal to Lord Krishna, because devotees are dearer to Lord Krishna than himself.
तात्पर्य
भगवान के साथ एकता की कल्पना स्वामी को दी जाने वाली अनंत सेवा से निम्न है क्योंकि स्वामी कृष्ण भक्तों से अपने आप से ज्यादा लगाव रखते हैं। श्रीमद् भागवतम (9.4.68) में स्वामी स्पष्ट रूप से कहते हैं:

साधवो हृदयं मयम साधृनां हृदयं त्वह्म्‌

मद अन्यत ते न जानंति नाहा तेभ्यो मनग अपि

"भक्त मेरे हृदय हैं, और मैं अपने भक्तों का हृदय हूँ। मेरे भक्त मेरे अतिरिक्त किसी और को नहीं जानते; इसी तरह, मैं अपने भक्तों के अलावा किसी और को नहीं जानता।" भगवान और उनके भक्तों के बीच का यह अंतरंग रिश्ता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)