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श्लोक 1.5.93  |
यस्यांशांशः श्रील - गर्भाद - शायी यन्नाभ्यब्जे लोक - सङ्घात - नालम् ।
लोक - स्रष्टुः सूतिका - धाम धातुस् तं श्री - नित्यानन्द - रामं प्रपद्ये ॥93॥ |
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| अनुवाद |
| मैं उन श्री नित्यानंद राम के चरणों में पूर्ण वंदना करता हूँ, जिनके अंश गर्भोदकशायी विष्णु हैं। गर्भोदकशायी विष्णु की नाभि से वह कमल उत्पन्न होता है जो ब्रह्माण्ड के रचयिता ब्रह्मा का जन्मस्थान है। उस कमल का तना असंख्य ग्रहों का विश्राम स्थल है। |
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| I bow to the feet of Sri Nityananda Rama, whose fullness is Garbhodakasayi Vishnu. From the navel of this Garbhodakasayi Vishnu springs a lotus, the birthplace of Brahma, the architect of the universe. The stem of this lotus is the resting place of countless worlds. |
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