श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  1.5.67 
अगण्य, अनन्त व्रत अण्ड - सन्निवेश ।
तत - रूपे पुरुष करे सबाते प्रकाश ॥67॥
 
 
अनुवाद
पुरुष असंख्य ब्रह्माण्डों में से प्रत्येक में प्रवेश करता है। जितने ब्रह्माण्ड हैं, उतने ही रूपों में वह स्वयं को प्रकट करता है।
 
The Purusha enters each of the countless universes. He manifests himself in as many different forms as there are universes.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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