श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  1.5.52 
वैकुण्ठ बेड़िया एक आछे जल - निधि ।
अनन्त, अपार - तार नाहिक अवधि ॥52॥
 
 
अनुवाद
वैकुंठ के चारों ओर जल का एक ऐसा भंडार है जो अंतहीन, अथाह और असीमित है।
 
There is immense water around Vaikuntha, which is infinite, deep and limitless.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd