श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  1.5.50 
माया - भर्ताजाण्ड - सङ्घाश्रयाङ्गः शेते साक्षात्कारणाम्भोधि - मध्ये ।
यस्यैकांशः श्री - पुमानादि - देवस् तं श्री - नित्यानन्द - रामं प्रपद्ये ॥50॥
 
 
अनुवाद
मैं श्री नित्यानंद राम के चरणों में पूर्ण नमस्कार करता हूँ, जिनके अंश स्वरूप कारणोदकशायी विष्णु, कारण सागर में लेटे हुए हैं, वे आदि पुरुष, माया के स्वामी तथा समस्त ब्रह्माण्डों के आश्रय हैं।
 
I offer my full obeisances at the feet of Sri Nityananda Rama, whose part is the original man Vishnu, reclining in the causal ocean, the husband of Maya and the support of all the universes.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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