श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  1.5.45 
‘जीव - नाम तटस्थाख्य एक शक्ति हय ।
महा - सङ्कर्षण - सब जीवेर आश्रय ॥45॥
 
 
अनुवाद
एक सीमांत शक्ति है, जिसे जीव कहते हैं। महासंकर्षण सभी जीवों का आश्रय है।
 
There is a neutral energy called the living entity. Mahasankarshana is the refuge of all living entities.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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