| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 1: आदि लीला » अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ » श्लोक 33 |
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| | | | श्लोक 1.5.33  | ‘सिद्ध - लोक’ नाम तार प्रकृतिर पार ।
चित्स्वरूप, ताँहा नाहि चिच्छक्ति विकार ॥33॥ | | | | | | | अनुवाद | | उस क्षेत्र को सिद्धलोक कहते हैं, और वह भौतिक प्रकृति से परे है। उसका सार आध्यात्मिक है, किन्तु उसमें आध्यात्मिक विविधताएँ नहीं हैं। | | | | This region is called Siddhaloka and is beyond the physical realm. It is spiritual, but it lacks spiritual diversity. | | ✨ ai-generated | | |
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