| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 1: आदि लीला » अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ » श्लोक 32 |
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| | | | श्लोक 1.5.32  | वैकुण्ठ - बाहिरे एक ज्योतिर्मय मण्डल ।
कृष्णेर अङ्गेर प्रभा, परम उज्वल ॥32॥ | | | | | | | अनुवाद | | वैकुण्ठ लोक के बाहर चमकते तेज का वातावरण है, जिसमें भगवान कृष्ण के शरीर की परम उज्ज्वल किरणें सम्मिलित हैं। | | | | Outside the Vaikuntha planet there is an atmosphere of radiant light, which is made up of the extremely bright rays of Lord Krishna's body. | | ✨ ai-generated | | |
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