श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 225
 
 
श्लोक  1.5.225 
साक्षात्व्रजेन्द्र - सुत इथे नाहि आन ।
येबा अज्ञे करे ताँरे प्रतिमा - हेन ज्ञान ॥225॥
 
 
अनुवाद
इसमें कोई संदेह नहीं कि वे व्रजराज के पुत्र हैं। केवल मूर्ख ही उन्हें मूर्ति मानता है।
 
Indeed, he is the son of Vrajaraj himself. Only the foolish believe him to be an idol.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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