श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 218-219
 
 
श्लोक  1.5.218-219 
वृन्दावने योग - पीठे कल्प - तरु - वने ।
रत्न - मण्डप, ताहे रत्न - सिंहासने ॥218॥
श्री - गोविन्द वसियाछेन व्रजेन्द्र - नन्दन ।
माधुर्य प्रकाशि’ करेन जगत्मोहन ॥219॥
 
 
अनुवाद
वृन्दावन के मुख्य मंदिर में रत्नों से बनी वेदी पर, कल्पवृक्षों के वन के बीच, ब्रजराज के पुत्र भगवान गोविंद रत्नों के सिंहासन पर विराजमान हैं तथा अपनी पूर्ण महिमा और माधुर्य को प्रकट करते हुए सम्पूर्ण जगत को मोहित कर रहे हैं।
 
In the main temple of Vrindavan, in the middle of the forest of Kalpavriksha trees, on an altar made of gems, Lord Govinda, the son of Vrajaraj, is seated on a throne of gems and is captivating the entire world by radiating his full glory and sweetness.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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