श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ  »  श्लोक 183
 
 
श्लोक  1.5.183 
‘उठ’, ‘उठ’ बलि’ मोरे बले बार बार।
उठि’ ताँर रूप दे खि’ हैनु चमत्कार ॥183॥
 
 
अनुवाद
"उठो! उठो!" वह मुझसे बार-बार कह रहा था। उठते ही, मैं उसकी सुंदरता देखकर बहुत चकित रह गया।
 
She repeatedly told me, "Get up, get up!" When I got up, I was astonished by her beauty.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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