| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 1: आदि लीला » अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ » श्लोक 121 |
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| | | | श्लोक 1.5.121  | सहस्र - वदने करे कृष्ण - गुण गान ।
निरवधि गुण गान, अन्त नाहि पान ॥121॥ | | | | | | | अनुवाद | | अपने हजारों मुखों से वे भगवान कृष्ण की महिमा का गान करते हैं, किन्तु यद्यपि वे सदैव इसी प्रकार गाते हैं, फिर भी उन्हें भगवान के गुणों का अन्त नहीं मिलता। | | | | With their thousands of mouths they sing the glories of Lord Krishna, but despite always singing in this manner they never surpass the Lord's qualities. | | ✨ ai-generated | | |
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