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श्लोक 106
श्लोक
1.5.106
हिरण्य - गर्भ, अन्तर्यामी, जगत्का रण ।
याँर अंश करि’ करे विराट - कल्पन ॥106॥
अनुवाद
वे परमात्मा हिरण्यगर्भ हैं, जो भौतिक जगत के कारण हैं। विश्वरूप की कल्पना उनके विस्तार के रूप में की जाती है।
They are the cause of God, Hiranyagarbha i.e. the material world. Virat form is considered to be his part.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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