vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री चैतन्य चरितामृत
»
लीला 1: आदि लीला
»
अध्याय 5: भगवान् नित्यानन्द बलराम की महिमाएँ
»
श्लोक 105
श्लोक
1.5.105
रुद्र - रूप धरि करे जगत्संहार ।
सृष्टि - स्थिति - प्रलय - इच्छाय याँहार ॥105॥
अनुवाद
रुद्र रूप धारण करके वे सृष्टि का संहार करते हैं। इस प्रकार सृष्टि, पालन और प्रलय उनकी इच्छा से ही होते हैं।
He assumes the form of Rudra and destroys the universe. Thus, creation, sustenance, and destruction occur at His will.
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd