श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  1.4.81 
तार मध्ये व्रजे नाना भाव - रस - भेदे ।
कृष्णके कराय रासादिक - लीलास्वादे ॥81॥
 
 
अनुवाद
इनमें व्रज में विविध प्रकार की स्त्रियों के समूह हैं, जिनके भाव और मधुरता विविध हैं। वे भगवान कृष्ण को रास नृत्य और अन्य लीलाओं का रसास्वादन कराने में सहायता करती हैं।
 
Among these are several groups of Vraja's beloveds, who possess a variety of emotions and sentiments. They help Krishna savor the full sweetness of the Rasa dance and other pastimes.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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