श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  1.4.68 
ह्लादिनीर सार ‘प्रेम’, प्रेम - सार ‘भाव’ ।
भावेर परम - काष्ठा, नाम ‘महा - भाव’ ॥68॥
 
 
अनुवाद
ह्लादिनी शक्ति का सार भगवत्प्रेम है, भगवत्प्रेम का सार भावना है, तथा भावना का चरम विकास महाभाव है।
 
The essence of Hladini Shakti is love for God, the essence of love for God is emotion and the ultimate development of emotion is Mahabhava.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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