श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  1.4.66 
सत्त्वं विशुद्धं वसुदेव - शब्दितं यदीयते तत्र पुमानपावृतः ।
सत्त्वे च तस्मिन्भगवान्वा सुदेवो ह्यधोक्षजो मे मनसा विधीयते ॥66॥
 
 
अनुवाद
"शुद्ध सत्व की वह अवस्था, जिसमें भगवान् बिना किसी आवरण के प्रकट होते हैं, वासुदेव कहलाती है। उस शुद्ध अवस्था में, भौतिक इंद्रियों से परे, वासुदेव नाम से विख्यात, परम भगवान् का मेरे मन द्वारा साक्षात्कार होता है।"
 
"The state of pure Sattva, in which the Supreme Personality of Godhead appears without any covering, is called Vasudeva. In that pure state, the Lord, transcendental to the material senses and called Vasudeva, is experienced in my mind."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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