श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  1.4.46 
अतएव मधुर रस कहि तार नाम ।
स्वकीया - परकीया - भावे द्वि - विध संस्थान ॥46॥
 
 
अनुवाद
इसलिए मैं इसे मधुर-रस कहता हूँ। इसके और भी दो भाग हैं, विवाहित प्रेम और अविवाहित प्रेम।
 
That's why I call it sweet juice. It also has two divisions – Swakiya i.e. married love and Parakiya i.e. unmarried love.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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