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श्लोक 1.4.43  |
निज निज भाव सबे श्रेष्ठ क रि’ माने ।
निज - भावे करे कृष्ण - सुख आस्वादने ॥43॥ |
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| अनुवाद |
| प्रत्येक भक्त को लगता है कि उसकी भावना सबसे उत्कृष्ट है और इस प्रकार उस भाव में वह भगवान कृष्ण के साथ महान सुख का अनुभव करता है। |
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| Every type of devotee believes that his feeling is the best and thus in that feeling he enjoys supreme happiness with Lord Krishna. |
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