भगवान चैतन्य राधारानी की भूमिका स्वीकार कर चुकें हैं | और हमे उस स्थिति का समर्थन करना चाहिए | ठीक उसी तरह जैसे गंभीरा में स्वरूप दामोदर जी ने किया। (जहाँ जगन्नाथपुरी में भगवान चैतन्य महाप्रभु का प्रवास था)| भगवान चैतन्य जी को वे हमेशा राधा की विरह वेदना की याद दिलाते थे | जिसका वर्णन श्रीमद् भागवतम् में है | और भगवान चैतन्य उनकी इस सहायता की सराहना करते थे | लेकिन गौर नागरियाँ जो भगवान चैतन्य को भोक्ता मानते हैं और खुद को उसका भोग्य | भगवान चैतन्य और उनके अनुयायियों दोनों द्वारा ही अस्वीकार्य हैं| मूर्खतापूर्ण नकल करने वाले धन्य होने की बजाए एकदम पृथक हो जाते हैं | उनकी ये कल्पनाएँ भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के सिद्धांतों के विरुद्ध हैं | कृष्ण द्वारा आनंद लेने के दार्शनिक सिद्धांत में राधारानी की भूमिका में कृष्ण से विरह की भावना वाला दार्शनिक सिद्धांत मिला हुआ नहीं हो सकता |
