| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 1: आदि लीला » अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण » श्लोक 36-37 |
|
| | | | श्लोक 1.4.36-37  | एइ वाञ्छा यैछे कृष्ण - प्राकट्य - कारण ।
असुर - संहार - आनुषङ्ग प्रयोजन ॥36॥
एइ मत चैतन्य - कृष्ण पूर्ण भगवान् ।
युग - धर्म - प्रवर्तन नहे ताँर काम ॥37॥ | | | | | | | अनुवाद | | जिस प्रकार ये इच्छाएँ कृष्ण के आविर्भाव का मूल कारण हैं, जबकि असुरों का विनाश एक आकस्मिक आवश्यकता है, उसी प्रकार भगवान् श्री कृष्ण चैतन्य के लिए युग धर्म का प्रचार करना आकस्मिक है। | | | | Just as these desires are the root cause of the appearance of Sri Krishna and the killing of demons is merely a relevant requirement, similarly the promulgation of the Yuga Dharma by the Supreme Personality of Godhead, Sri Krishna Chaitanya, is relevant. | | ✨ ai-generated | | |
|
|