श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  1.4.33 
व्रजेर निर्मल राग शुनि’ भक्त - गण ।
राग - मार्गे भजे येन छाड़ि’ धर्म - कर्म ॥33॥
 
 
अनुवाद
"तब ब्रजवासियों के शुद्ध प्रेम के विषय में सुनकर भक्तगण समस्त धार्मिक कर्मकाण्डों तथा सकाम कर्मों को त्यागकर सहज प्रेम के मार्ग से मेरी पूजा करेंगे।"
 
“Then, hearing about the pure love of the people of Vraja, the devotees will abandon all religious rituals and worldly activities and worship me through the path of passionate love.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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