श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  1.4.30 
आमिह ना जानि ताहा, ना जाने गोपी - गण ।
दुँहार रूप - गुणे दुँहार नित्य ह रे मन ॥30॥
 
 
अनुवाद
“न तो गोपियाँ और न ही मैं इस पर ध्यान दूँगी, क्योंकि हमारे मन सदैव एक-दूसरे के सौंदर्य और गुणों से मोहित रहेंगे।
 
Neither the Gopis nor I will be able to know this, because our minds will always be fascinated by each other's beauty and qualities.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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