श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 273
 
 
श्लोक  1.4.273 
एइ त’ करिलुँ षष्ठ श्लोकेर व्याख्यान ।
श्री - रूप - गोसाञि र पाद - पद्म क रि’ ध्यान ॥273॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मैंने श्री रूप गोस्वामी के चरणकमलों का ध्यान करके छठे श्लोक की व्याख्या की है।
 
Meditating on the lotus feet of Sri Rupa Goswami, I have explained the sixth verse in this way.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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