श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  1.4.27-28 
एइ शुद्ध - भक्त लञा करिमु अवतार ।
करिब विविध - विध अद्भुत विहार ॥27॥
वैकुण्ठाद्ये नाहि ये ये लीलार प्रचार ।
से से लीला करिब, याते मोर चमत्कार ॥28॥
 
 
अनुवाद
"मैं इन शुद्ध भक्तों को साथ लेकर अवतरित होऊँगा और वैकुंठ में भी अज्ञात अनेक अद्भुत लीलाओं में क्रीड़ा करूँगा। मैं ऐसी लीलाएँ सुनाऊँगा जिनसे मैं भी चकित हो जाऊँगा।"
 
"I will descend with these pure devotees and perform many wonderful pastimes, unknown even in Vaikuntha. I will spread such pastimes that even I myself will be astonished."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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