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श्लोक 1.4.27-28  |
एइ शुद्ध - भक्त लञा करिमु अवतार ।
करिब विविध - विध अद्भुत विहार ॥27॥
वैकुण्ठाद्ये नाहि ये ये लीलार प्रचार ।
से से लीला करिब, याते मोर चमत्कार ॥28॥ |
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| अनुवाद |
| "मैं इन शुद्ध भक्तों को साथ लेकर अवतरित होऊँगा और वैकुंठ में भी अज्ञात अनेक अद्भुत लीलाओं में क्रीड़ा करूँगा। मैं ऐसी लीलाएँ सुनाऊँगा जिनसे मैं भी चकित हो जाऊँगा।" |
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| "I will descend with these pure devotees and perform many wonderful pastimes, unknown even in Vaikuntha. I will spread such pastimes that even I myself will be astonished." |
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