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श्लोक 1.4.262  |
आमा हैते राधा पाय ये जातीय सुख ।
ताहा आस्वादिते आमि सदाइ उन्मुख ॥262॥ |
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| अनुवाद |
| “मैं सदैव उस आनंद का आस्वादन करने के लिए उत्सुक रहता हूँ जो राधारानी मुझसे प्राप्त करती हैं। |
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| I am always eager to taste the happiness that Radharani receives from me. |
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