श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 260
 
 
श्लोक  1.4.260 
रूपे कंस - हरस्य लुब्ध - नयनां स्पर्शेऽतिहृष्यत्त्वचं वाण्यामुत्कलित - श्रुतिं परिमले संछ - नासा - पुटाम् ।
आरज्यद्रसनां किलाधर - पुटे न्यञ्चन्मुखाम्भोरुहां दम्भोगीर्ण - महा - धृतिं बहिरपि प्रोद्यद्विकाराकुलाम् ॥260॥
 
 
अनुवाद
"उसकी आँखें कंस के शत्रु भगवान कृष्ण की सुन्दरता पर मोहित हो जाती हैं। उनके स्पर्श से उसका शरीर आनंद से पुलकित हो उठता है। उसके कान सदैव उनकी मधुर वाणी की ओर आकर्षित रहते हैं, उसके नथुने उनकी सुगंध से मोहित हो जाते हैं, और उसकी जीभ उनके कोमल अधरों के रस के लिए लालायित रहती है। वह अपना कमल-सदृश मुख नीचे झुकाए रहती है, केवल दिखावे के लिए संयम का अभ्यास करती है, परन्तु वह भगवान कृष्ण के प्रति अपने सहज प्रेम के बाह्य लक्षण प्रकट करने से स्वयं को नहीं रोक पाती।"
 
"Her eyes are captivated by the beauty of Lord Krishna, the enemy of Kamsa. Her body ecstasies at Krishna's touch. Her ears are always drawn to his sweet voice. Her nose is captivated by his fragrance, and her tongue yearns to drink the nectar of his soft lips. She feigns self-control and hangs her lotus-like face, but she cannot prevent the outward manifestation of her spontaneous, passionate love for Krishna."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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