श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 259
 
 
श्लोक  1.4.259 
निर्भूतामृत - माधुरी - परिमलः कल्याणि बिम्बाधरो वक्त्रं पङ्कज - सौरभं कुहरित - श्लाघा - भिदस्ते गिरः ।
अङ्गं चन्दन - शीतलं तनुरियं सौन्दर्य - सर्वस्व - भाक् त्वामासाद्य ममेदमिन्द्रिय - कुलं राधे मुहुर्मोदते ॥259॥
 
 
अनुवाद
"मेरी प्रिय शुभ राधारानी, ​​आपका शरीर समस्त सौंदर्य का स्रोत है। आपके लाल होंठ अमर माधुर्य की अनुभूति से भी अधिक कोमल हैं, आपके मुख पर कमल पुष्प की सुगंध है, आपके मधुर शब्द कोयल की वाणी को परास्त करते हैं, और आपके अंग चंदन के गूदे से भी शीतल हैं। आपके सुन्दर गुणों से पूर्णतया अलंकृत स्वरूप का आस्वादन करके मेरी सभी दिव्य इन्द्रियाँ आनंद से अभिभूत हो जाती हैं।"
 
"O Kalyani Radharani, your body is the source of all beauty. Your red lips are softer than the nectar of sweetness, your face is filled with the fragrance of a lotus flower, your sweet voice surpasses the call of a cuckoo, and your limbs are cooler than sandalwood paste. All my divine senses are delighted to taste you, adorned with virtues.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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