श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 258
 
 
श्लोक  1.4.258 
अन्येर सङ्गमे आमि व्रत सुख पाइ ।
ताहा हैते राधा - सुख शत अधिकाइ ॥258॥
 
 
अनुवाद
“राधारानी से मिलकर मुझे जो खुशी मिलती है, वह दूसरों से मिलकर मिलने वाली खुशी से सौ गुना अधिक होती है।
 
The happiness I get from meeting Radharani is hundreds of times greater than the happiness I get from meeting others.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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