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श्लोक 1.4.257  |
दोहार ये सम - रस, भरत - मुनि माने ।
आमार व्रजेर रस सेह नाहि जाने ॥257॥ |
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| अनुवाद |
| "भरत मुनि ने कहा है कि प्रेमी और प्रेमिका का राग समान है। परन्तु वे मेरे वृन्दावन के राग को नहीं जानते। |
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| "Bharat Muni has said that the love of a lover and his beloved is the same. But even he does not know the love of my Vrindavan. |
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