श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 257
 
 
श्लोक  1.4.257 
दोहार ये सम - रस, भरत - मुनि माने ।
आमार व्रजेर रस सेह नाहि जाने ॥257॥
 
 
अनुवाद
"भरत मुनि ने कहा है कि प्रेमी और प्रेमिका का राग समान है। परन्तु वे मेरे वृन्दावन के राग को नहीं जानते।
 
"Bharat Muni has said that the love of a lover and his beloved is the same. But even he does not know the love of my Vrindavan.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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