श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 254
 
 
श्लोक  1.4.254 
ताम्बूल - चर्वित यबे करे आस्वादने ।
आनन्द - समुद्रे डुबे, किछुइ ना जाने ॥254॥
 
 
अनुवाद
“जब वह मेरे द्वारा चबाये गये पान का स्वाद लेती है, तो वह आनन्द के सागर में विलीन हो जाती है और बाकी सब कुछ भूल जाती है।
 
When she tastes the betel leaf chewed by me, she drowns in the ocean of bliss and forgets everything.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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