श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण  »  श्लोक 253
 
 
श्लोक  1.4.253 
अनुकूल - वाते यदि पाय मोर गन्ध ।
उड़िया पड़िते चाहे, प्रेमे हय अन्ध ॥253॥
 
 
अनुवाद
“जब एक अनुकूल हवा मेरे शरीर की सुगंध को अपने पास ले आती है, तो वह प्रेम से अंधी हो जाती है और उस हवा में उड़ने की कोशिश करती है।
 
“When the favourable wind carries the fragrance of my body to her, she becomes blinded by love and wants to fly in that wind.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)