| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 1: आदि लीला » अध्याय 4: श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण » श्लोक 252 |
|
| | | | श्लोक 1.4.252  | कृष्ण - आलिङ्गन पाइनु, जनम सफले ।
कृष्ण - सुखे मग्न रहे वृक्ष करि’ कोले ॥252॥ | | | | | | | अनुवाद | | वह सोचती है, 'मुझे श्रीकृष्ण का आलिंगन मिल गया है, इसलिए अब मेरा जीवन पूर्ण हो गया है।' इस प्रकार वह वृक्ष को अपनी गोद में लेकर कृष्ण को प्रसन्न करने में लीन रहती है। | | | | “She thinks, ‘I am receiving Krishna’s embrace, so my life has become meaningful.’ Thus, she embraces the tree in her arms and remains absorbed in pleasing Krishna.” | | ✨ ai-generated | | |
|
|